Tuesday, April 21, 2026

अंदाज़-ए-गालिब

 ऐ गालिब...

शायरी छोड़, तू पेड़ लगाया कर,

कि धूप में भी कुछ छांव रहेगी।

गालिब बोले...

धूप-छांव तो कुदरत का खेल है मियाँ,

मेरी शायरी से ही तो आशिक़ों की चाल चलेगी।

और जब दिल टूटेगा... और जब दिल टूटेगा...

मेरी शायरी से ही तो उस टूटे दिल को राह मिलेगी।

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